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19
يا أَيُّهَا الَّذينَ آمَنوا لا يَحِلُّ لَكُم أَن تَرِثُوا النِّساءَ كَرهًا ۖ وَلا تَعضُلوهُنَّ لِتَذهَبوا بِبَعضِ ما آتَيتُموهُنَّ إِلّا أَن يَأتينَ بِفاحِشَةٍ مُبَيِّنَةٍ ۚ وَعاشِروهُنَّ بِالمَعروفِ ۚ فَإِن كَرِهتُموهُنَّ فَعَسىٰ أَن تَكرَهوا شَيئًا وَيَجعَلَ اللَّهُ فيهِ خَيرًا كَثيرًا

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

ऐ ईमान लानेवालो! तुम्हारे लिए वैध नहीं कि स्त्रियों के माल के ज़बरदस्ती वारिस बन बैठो, और न यह वैध है कि उन्हें इसलिए रोको और तंग करो कि जो कुछ तुमने उन्हें दिया है, उसमें से कुछ ले उड़ो। परन्तु यदि वे खुले रूप में अशिष्ट कर्म कर बैठे तो दूसरी बात है। और उनके साथ भले तरीक़े से रहो-सहो। फिर यदि वे तुम्हें पसन्द न हों, तो सम्भव है कि एक चीज़ तुम्हें पसन्द न हो और अल्लाह उसमें बहुत कुछ भलाई रख दे