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20
وَيَقولُ الَّذينَ آمَنوا لَولا نُزِّلَت سورَةٌ ۖ فَإِذا أُنزِلَت سورَةٌ مُحكَمَةٌ وَذُكِرَ فيهَا القِتالُ ۙ رَأَيتَ الَّذينَ في قُلوبِهِم مَرَضٌ يَنظُرونَ إِلَيكَ نَظَرَ المَغشِيِّ عَلَيهِ مِنَ المَوتِ ۖ فَأَولىٰ لَهُم

फ़ारूक़ ख़ान & नदवी

और मोमिनीन कहते हैं कि (जेहाद के बारे में) कोई सूरा क्यों नहीं नाज़िल होता लेकिन जब कोई साफ़ सरीही मायनों का सूरा नाज़िल हुआ और उसमें जेहाद का बयान हो तो जिन लोगों के दिल में (नेफ़ाक़) का मर्ज़ है तुम उनको देखोगे कि तुम्हारी तरफ़ इस तरह देखते हैं जैसे किसी पर मौत की बेहोशी (छायी) हो (कि उसकी ऑंखें पथरा जाएं) तो उन पर वाए हो