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155
وَاختارَ موسىٰ قَومَهُ سَبعينَ رَجُلًا لِميقاتِنا ۖ فَلَمّا أَخَذَتهُمُ الرَّجفَةُ قالَ رَبِّ لَو شِئتَ أَهلَكتَهُم مِن قَبلُ وَإِيّايَ ۖ أَتُهلِكُنا بِما فَعَلَ السُّفَهاءُ مِنّا ۖ إِن هِيَ إِلّا فِتنَتُكَ تُضِلُّ بِها مَن تَشاءُ وَتَهدي مَن تَشاءُ ۖ أَنتَ وَلِيُّنا فَاغفِر لَنا وَارحَمنا ۖ وَأَنتَ خَيرُ الغافِرينَ

फ़ारूक़ ख़ान & अहमद

मूसा ने अपनी क़ौम के सत्तर आदमियों को हमारे नियत किए हुए समय के लिए चुना। फिर जब उन लोगों को एक भूकम्प ने आ पकड़ा तो उसने कहा, "मेर रब! यदि तू चाहता तो पहले ही इनको और मुझको विनष्ट़ कर देता। जो कुछ हमारे नादानों ने किया है, क्या उसके कारण तू हमें विनष्ट करेगा? यह तो बस तेरी ओर से एक परीक्षा है। इसके द्वारा तू जिसको चाहे पथभ्रष्ट कर दे और जिसे चाहे मार्ग दिखा दे। तू ही हमारा संरक्षक है। अतः तू हमें क्षमा कर दे और हम पर दया कर, और तू ही सबसे बढ़कर क्षमा करनेवाला है