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61
وَمِنهُمُ الَّذينَ يُؤذونَ النَّبِيَّ وَيَقولونَ هُوَ أُذُنٌ ۚ قُل أُذُنُ خَيرٍ لَكُم يُؤمِنُ بِاللَّهِ وَيُؤمِنُ لِلمُؤمِنينَ وَرَحمَةٌ لِلَّذينَ آمَنوا مِنكُم ۚ وَالَّذينَ يُؤذونَ رَسولَ اللَّهِ لَهُم عَذابٌ أَليمٌ

फ़ारूक़ ख़ान & नदवी

और उसमें से बाज़ ऐसे भी हैं जो (हमारे) रसूल को सताते हैं और कहते हैं कि बस ये कान ही (कान) हैं (ऐ रसूल) तुम कह दो कि (कान तो हैं मगर) तुम्हारी भलाई सुन्ने के कान हैं कि ख़ुदा पर ईमान रखते हैं और मोमिनीन की (बातों) का यक़ीन रखते हैं और तुममें से जो लोग ईमान ला चुके हैं उनके लिए रहमत और जो लोग रसूले ख़ुदा को सताते हैं उनके लिए दर्दनाक अज़ाब हैं